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सनबीम स्कूल के डिजीटल मंच से बलिया की बेटी और सुप्रसिद्ध मनोचिकित्सक ने जगाई उम्मीद और हौसलौं की अलख



COVID-19 के कारण पिछले तीन महीनों से उत्पन्न दुविधा की स्थिति से सामाजिक, आर्थिक और मानसिक हालत  लगभग बद् से बदतर होते जा रहे हैं और धीरे-धीरे आम जनमानस इस विषम परिस्थितियों में अपना आत्मसंयम खोते जा रहे हैं वहीं सनबीम स्कूल बलिया अपने *Positive और Strong vision* के साथ अपने छात्रों, उनके अभिभावकों और अपने शिक्षकों के साथ पूरी तन्मयता से खड़ा है।

      विद्यालय के निदेशक डॉ कुँवर अरुण सिंह का कहना है कि बेशक आज हमारे छात्रों के लिए स्कूल के मुख्य दरवाजे बंद हैं, पूरे दिन में स्कूल की घंटी एक बार भी नहीं बजती है अब, स्कूल की बसें भी अपने यथास्थान खड़ी है। परंतु हमारे शिक्षक और छात्र निरन्तर अपने पथ पर अग्रसित है। नियमित Online कक्षाओं के साथ-साथ छात्रों को समय-समय पर अनेकों Online गतिविधियों जैसे QCT, YOGA, ARTS & CRAFTS और QUIZE के माध्यम से उनके उत्साह को जीवन्त रखा है।
श्री सिंह का मानना है कि आज हम जिस दुविधा और निराशा के वातावरण में जी रहे हैं इस अफरा-तफरी ने एक भय के महौल को जन्म देना शुरू कर दिया है। बच्चे पूरे समय घर में कैद हैं। माता-पिता के सामने उनकी कुशल Parenting को लेकर अनेकों मुश्किलें हैं। ऐसे में  एक मनोवैज्ञानिक ही हमें विचलित हुए बिना इन कठोर परिस्थितियों से बाहर निकाल सकता है।
कहते हैं ना कि-
 आज के बच्चें ही कल के भारत का भविष्य हैं।
इसमें माता-पिता और शिक्षकों, दोनों की ही भूमिका और मार्गदर्शन आवश्यसम्भावी है। 
PANDEMI ART & SCIENCE OF PARENTING IN PANDEMIC आज इसी विषय पर सनबीम स्कूल बलिया द्वारा ZOOM और FACEBOOK के माध्यम से एक बृहद स्तरीय डिजिटल सम्मेलन का सीधा प्रसारण और आयोजन किया गया। 

वेबिनार की मुख्य अतिथि बलिया की ही बेटी, सलोनी प्रिया, उम्मीद फाउंडेशन की डायरेक्टर, सुप्रसिद्ध मनोचिकित्सक, Parenting Expert, Therapist, और Educational Consultant द्वारा बेहतर Parenting के गुर साझा किए गये.

श्रीमती प्रिया का कहना है कि हम ऐसी ही विषम परिस्थितियों में अपनी जिंदगी को डील करना सीखते हैं और जब परिस्थितियाँ अनदेखी- अनजानी हो तो हमारा दायित्व और अधिक बढ़ जाता है कि हम ऐसा क्या करें कि हमारा मनोबल बना रहे। हमसे कुछ गलतियां भी होगीं लेकिन एक दूसरे का सहयोग बने रहने से हम अपना हौसला नहीं हारेंगे। क्योंकि हमारा सुख, हमारी खुशी, हमारी उन्नति समाजिक सहयोग से ही सम्भव है इसलिए हमें शारीरिक दूरी का पालन करना है समाजिक दूरी का नहीं। 
जब सूर्य ग्रहण लगता है तो कुछ देर के लिए अन्धेरा सूर्य को ढक देता है लेकिन सूर्य के जीवन देने की क्षमता को खत्म नहीं कर देता। ठीक वैसे ही इस महामारी रुपी बादलों ने भी कुछ समय के लिए हमें चारो तरफ से घेर लिया है। इसलिए उम्मीद का दामन छोड़े बिना हमें यह विश्वास रखना है कि जल्दी ही यह अन्धकार छंटेगा। 

उन्होंने आगे कहा कि Parenting एक जीवन पर्यन्त चलने वाला रिश्ता है। माता-पिता हर स्टेज, हर उम्र में बच्चों की देखभाल, उनका संरक्षण और मार्गदर्शन करते रहे हैं। परिवार ही वह शक्ति है जो उनके मन को दिशा देकर सम्भावनाओं के अनुरूप ढालता है। 
"Don’t limit a child is your own learning. For he was born in another time"
    ~Rabindranath Tagore
आप अपने बच्चों को उन सीमाओं में मत बाँधिए जो आपने सीखा है क्योंकि आने वाली दुनिया हमने भी नहीं देखी जिसके लिए हमे उन्हें तैयार करना है। एक दूसरे से लड़ते रहने से बेहतर है एक दूसरे का सहयोग करें। बच्चे उतनी ही बारिकियों से हमारा अवलोकन भी करते हैं जितना हम। ये दो तरफा रास्ता है। एक ऐसा दो तरफा शीशा जिसमें एक तरफ उनका अक्श दिखता है तो दूसरी तरफ निस्सन्देह हमारा अक्श भी उनको दिखता है।

हर उम्र एक मौसम की तरह है। हम आज जैसा बीज बोते हैं कल वैसी ही फसल तैयार होगी। इसलिए उनकी परवरिश 5 बिन्दुओं पर केंद्रित होनी चाहिए -
# Nurture #Balance #Love #Logic #Proactive  तभी सामंजस्य स्थापित होगा। 
आगे उन्होंने 4 P model of Parenting पर चर्चा की ~ 
P - Protector
P - Provider
P - Presents Possibilities
P - Priorities
आगे उन्होंने सुझाव दिया कि बच्चों को जीवन कौशल सीखाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना अध्ययन ताकि वो आत्मनिर्भर बन सकें। 
साथ ही बच्चों को हिदायत भी दी कि टेक्नोलॉजी के गुलाम मत बनिए। टेक्नोलॉजी के मास्टर बनिए। Gadgets Obsession की जगह उसका उपयोग अपने ज्ञान और क्षमता को बेहतर बनाने के लिए करें। 

क्योंकि Routine can Anchor Us  इसलिए हमें उन्हें रुटीन में बाँधना होगा तभी वो सन्तुलन बना सकेंगे। 15 से 18 साल ही हमें अपने बच्चों को सिंचने का मौका मिलता है फिर एक दिन वो परिन्दे की तरह उड़ जायेंगे। आप भाग्यशाली है कि आपको यह मौका मिला है। 

सबसे ज्यादा क्रान्तिकारी अवस्था किशोरावस्था है जब बच्चों को वास्तविक दुनिया और सपनो की दुनिया के बीच सामंजस्य सिखाना है। #Rebellion of teens अब से अपने रिश्ते की एक नई शुरुआत करें। #Fear vs Trust भय की बजाय विश्वास को बढाएं। 

आखिर में उन्होंने कहा कि Be Alert बच्चों के व्यवहार की निगरानी भी रखिए। अगर कुछ अलग दिखना शुरू हो जाय तो सतर्क हो जाइए शायद उनके सामने आने वाली दुनिया बहुत उलझन और मुश्किलों से भरी है जिसे आपने ही सुलझाना है। 

एक बेहतर माता-पिता अपने बच्चों के लिए सड़क के गड्ढों को नहीं भरते,बल्कि उन गड्ढों भरी सड़क पर मजबूती से चलना सीखाते हैं।

विद्यालय की प्रधानाचार्या श्रीमती सीमा ने अपने मनोभावों को अभिव्यक्त करते हुए उम्मीद पर एक सुन्दर सी कविता प्रस्तुत कर कार्यक्रम का आगाज किया। 
निदेशक डॉ कुँवर अरुण सिंह, ने अभिभावकों को  भरोसा दिलाया कि यह कठिन वक्त है इसमें हम सभी को एक दूसरे का सहयोग करते हुए आगे बढ़ना है और बहुत जल्दी ही हम ये लड़ाई जीत लेंगे। पूरा विद्यालय प्रबंधन मजबूती से एक दूसरे के साथ खड़ा है। 
 स्वस्थ्य रहें, सबल रहें, सुरक्षित रहें।  

जय हिन्द।


सनबीम स्कूल, बलिया के निदेशक डॉ कुंवर अरुण सिंह की कलम से

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