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महादेव व पार्वती विवाह का महापर्व है शिवरात्रि, महा शिवरात्रि पर दुर्लभ पंचयोग रहेगा विशेष फलदायी


 




रतसर (बलिया):पर्वों-त्योहारो, पुरानी लोककलाओं व संस्कृतियों के इस देश में यहां के लोग चाहे वो किसी भी धर्म,जाति, बिरादरी में संबद्ध हो, इन्हें मनाने, निर्वहन करने से कदापि पीछे नही हटते है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में चतुर्दशी को पड़ने वाली महाशिवरात्रि पर्व आज भी हमारे समाज में अति प्रासंगिक है। इस वर्ष यह महापर्व एक मार्च दिन मंगलवार को पड़ रहा है।

महाशिवरात्रि की महत्ता :

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इस महापर्व की महत्ता के बारे में धर्माचार्य पं० भरत पाण्डेय ने बताया कि इशान संहिता में शिवरात्रि की महानिशा के महात्म्य के बारे में कहा गया है कि इस तिथि कि महानिशा में आदि देव महादेव कोटि सूर्य के समान देदीप्यमान हो शिवलिंग के रूप में अवतरित हुए थे। इसी उपलक्ष्य में इस व्रत की उत्पति हुई। इस तिथि को जिस अंधकारयमय रजनी का उदय होता है उस महानिशा को ही महाशिवरात्रि कहा जाता है।

प्रचलित पौराणिक आख्यान :

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इस तिथि को महादेव का विवाह पर्वत राज हिमालय की पुत्री पार्वती के साथ हुआ था। इस कारण इस तिथि को शिव विवाहोत्सव के रूप में भी मनाए जाने की परम्परा है।

व्रत की महत्ता :

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शिवरात्रि व्रत में उपचार, रात्रि जागरण, पूजन और पारण का विशेष महत्ता है। चुतर्दशी तिथि के साथ महानिशा का संयोग होने का मुख्य कारण है कि इस तिथि को चंद्र व सूर्य एक दूसरे के काफी निकट रहते है। सूर्य व चन्द्र परमात्मा व जीवात्मा के बोधक है। चतुर्दशी में जीव बहुत कुछ शिव में डूब जाता है। यही शुभ मुर्हूत शिवोपासना का पुण्य लग्न है। इसके बाद अमावस्या के दिन जीवन जब शिव में पूर्ण रूप में डूब जाता है तभी व्रत की

 पूर्णता प्राप्त होती है और इस पूर्णता को पारण कहा जाता है।

कल्याण करने वाले है शिव शंकर :

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महा मृत्युंजय का जाप सपुट के साथ करना चाहिए। इसके साथ ही रुद्राष्टक और रामचरित मानस के बालकाण्ड में शंकर विवाह का परिव्रत पढ़कर महाशिवरात्रि का पूजन करना चाहिए । शिव का अर्थ है शुभ और शंकर का अर्थ होता है कल्याण करने वाला । निश्चित रूप से उन्हें प्रसन्न करने के लिए मनुष्य को शिव के अनुरूप ही बनना पड़ेगा । शिवोभुत्वा शिव पूजते अर्थात शिव बनकर ही शिव की पूजा करे। शंकर के ललाट पर स्थित चन्द्र शीतलता व संतुलन का प्रतीक है।

बन रहे दो खास संयोग :

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महा शिवरात्रि पर इस साल दो खास संयोग बन रहे है। भगवान शिव की पूजा के दौरान धनिष्ठा नक्षत्र के साथ परिघ योग बनेगा। धनिष्ठा और परिघ योग के बाद शतभिषा नक्षत्र और शिव योग का संयोग होगा । ज्योतिष के अनुसार परिघ योग में पूजा करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्ति होती है ।

कैसे करे शिव पूजा :

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जिसमें सारा जगत शमन करता है और जो विकार रहित है सर्व शक्तिमान और जगत कल्याणकारी है वही शिव है। रुद्र पूजा हर दृष्टि से करनी चाहिए । महा शिवरात्रि को ओम नमः शिवाय से शंकर जी की आराधना करे । चतुर्दशी के चार प्रहर होते है । पहले प्रहर में शंकर जी को दूध से दूसरे प्रहर में दही से, तीसरे प्रहर में घी से और चौथे प्रहर में शहर से स्नान कराना चाहिए । गंगाजल में काला तील डालकर शंकर जी को अर्पित करने से सारे कष्ट दूर होते है । 

रिपोर्ट : धनेश पाण्डेय

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