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अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने वाला होता हैं सन्यासी:-जीयर स्वामी




दुबहर:-अपनी इंद्रियों अपने आहार व्यवहार को नियंत्रित करना ही सन्यास है।  गेरुआ वस्त्र धारण करना दंड ,कमंडल लेकर चलना सन्यासी की पहचान नहीं है ,सन्यासी वह है जो कर्म करके फल की इच्छा ना करें।  और समर्पण भाव से प्रभु की भक्ति में लीन रहे। उक्त बातें दुबहर क्षेत्र के जनेश्वर मिश्र सेतु एप्रोच मार्ग के किनारे हो रहे चातुर्मास व्रत में गुरुवार  की देर शाम प्रवचन करते हुए महान मनीषी  संत श्री त्रिदंडी स्वामी जी के शिष्य लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी ने प्रवचन में कही। 

बतलाया कि महर्षि वेदव्यास भगवान ने भगवान श्रीमन्नारायण  जी की प्रेरणा से नारद जी की आज्ञा  व गणेश जी की सहायता से श्रीमद् भागवत महापुराण ग्रंथ की रचना की ,महर्षि व्यास जी की इच्छा थी मेरी बौद्धिक विरासत  जो  श्रीमद्भागवत महापुराण है इसका उपयुक्त उत्तराधिकारी कौन हो महर्षि वेदव्यास जी ने पूरी दुनिया में अपनी दृष्टि को घुमाया और चिंतन किया, उन्हें कहीं भी भागवत महापुराण का उपयुक्त उत्तराधिकारी नहीं मिला।  महर्षि वेदव्यास जी ने भगवान श्रीमन्नारायण ,भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती से निवेदन किए कि हे प्रभु आप ही  के समान मेरा पुत्र होना चाहिए जिसका नाम ,यश, कीर्ति पूरी दुनिया में विख्यात हो तथा वह निष्ठावान हो। 

भगवान श्रीमन्नारायण की कृपा से सुखदेव भगवान वेदव्यास नंदन के रूप में उनके घर अवतरित हुए सुखदेव भगवान जन्म लेते ही घर के सुख को छोड़ कर  सन्यासियों की दिनचर्या को अपना जीवन बना कर जंगल की राह पकड़ लिए।   आध्यात्मिक रूप से तत्वों के रूप  में उन्होंने संन्यास की दीक्षा को प्राप्त कर लिया था। 

कहां की वेश के साथ-साथ उद्देश्य व लक्ष्य भी पवित्र होना चाहिए। 

बतलाया कि रावण ने भी सन्यासी का भेष धारण किया था लेकिन वह सन्यासी  नहीं था। 

हमारे जीवन की जो भी दिनचर्या है आंख से देखना ,कान से सुनना, मुख से बोलना, नाक से सूंघना हमारी जीवन की जितनी भी इंद्रियां है उन सभी इंद्रियों को परमात्मा से जोड़ना ही अपने आप में सन्यास है।  बतलाया कि जीवन में कोई भी कार्य करने से पहले परमात्मा को एक बार अवश्य याद कर लेना चाहिए।

रिपोर्ट:-नितेश पाठक

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