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गुणों से होती है साधु की पहचान:- जीयर स्वामी




दुबहर :- भारत के महान मनीषी संत त्रीदंडी स्वामी जी महाराज के कृपा पात्र शिष्य लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने महर्षि भृगु की पावन तपोभूमि पर हो रहे अपने चातुर्मास व्रत में प्रवचन के दौरान कहा कि   लाल, पिला वस्त्र पहनकर, दाढ़ी बढ़ाकर, चिमटा और कमंडल लेकर घूमना साधु की परिभाषा नहीं है।  केवल वेश धारण कर लेना साधु का सूचक नहीं है। उन्होंने कहा कि वेश हों और इसके साथ साथ हमारा उद्देश्य ठीक नहीं है तो हम साधु के अधिकारी नहीं हो सकते हैं। विपत्ति में धैर्य का त्याग नहीं करना, पद व प्रतिष्ठा बढ़ने पर सहज हो जाना ,वाणी से समाज में समन्वय व सौहार्द स्थापित करने वाला , समाज व संस्कृति में रक्षा करने वाला, अच्छे कर्मों को करने वाला  वाला ही साधु कहलाता है। उन्होंने कहा कि संत ,महात्मा व महापुरुषों की संगत से उद्देश्य तथा लक्ष्य की प्राप्ति होती है।


स्वामी जी महाराज ने कहा कि कामी, लोभी, कुकर्मी व कदाचारी व्यक्ति का संग नरक देने वाला होता है। जबकि सदाचारी, समाजसेवी और सौहार्दसेवी पुरूष का संगत हमें आत्मकल्याण कराने वाला होता है। शास्त्र में बताया गया है कि घर में रहे चाहे धर्मशाला, मठ में रहे, भोगवादिता और विषयवादिता में रहनेवाले, कदाचार से जीवन जीने वाले व्यक्ति का संगत नहीं करनी चाहिए। जिस प्रकार से मनुष्य को शरीर रक्षा के लिए भोजन करना चाहिए, वस्त्र पहनना चाहिए, औषधि खाना चाहिए  इसके साथ ही लोगों के साथ अच्छा व्यवहार भी करना चाहिए।

स्वामी जी ने बतलाया की सच्चे साधु की पहचान उसके गुणों से होती है न कि वेशभूषा से। अगर वेशभूषा बदलने से लोग साधु हो जाएं तो हम रावण को भी साधु ही समझेंगे।



रिपोर्ट:- नितेश पाठक

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