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हमारी भी सुनों सरकार बच्चे होते हैं भगवान का रुप



रसड़ा(बलिया) जी हाँ वैश्विक महामारी ने देश के अंदर प्रतिदिन बढ रही कोरोना मरीजों की संख्या को देखतें हुए जनपद के आलाधिकारी पूरी तरह अलर्ट मोड मे आ गया है।ऐसे में माँ के पेट से निकल कर सीधी पीठ पर पलकर अपनी जिन्दगी की शुरूआत करने वाले मुसाफिर आज ईंट भट्ठों पर दम तोड़ते नज़र आ रहे हैं। लाँक डाउन के चलते भट्ठों पर दो महिनों से  ईंट का उत्पादन ठप हो गया।
 जनपद का ऐसी कोई ईंट भट्ठा नहीं, जहाँ  मजदूर और पथेरा न फंसे हुए हों ।जिनमें महिलाएं और मासूम बच्चे भी शामिल हैं।  लाकडाऊन से इनकी जिंदगी ठप हो गयी।  इन चालीस दिनों में  ईंट भट्ठों पर ईंटों की टुकड़ों के ढेर लग गए हैं। कोयला  की आपूर्ति न होने से नया उत्पादन बंद हो गया है।ऐसे में इन मजदूरों की स्थिति चिन्तनीय हो गयी।शासन प्रशासन का ध्यान ऐसे मजदूरों की ओर नहीं गया है कि वे भी अपने गाँव लौटने की व्यवस्था दी जाय। वहीं भट्ठा मालिक इनके  राशन-पानी का खर्च संभालते-संभालते अब हाथ खङे करने लगे हैं।ऐसी स्थिति में ईंट भट्ठों पर काम करने वाले मजदूरों खासकर महिलाओं मासूमों की जिन्दगी अनिश्चितताओं के भंवर में फंसी दिखाई दे रही है और उनके पेट से निकल कर उनकी पीठों पर पलने वाले मुसाफिरों की जिंदगी तो दम तोड़ती ही नज़र आ रही है।




रिपोर्ट : पिन्टू सिंह

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