यूपी के मऊ में कानून व्यवस्था चरमराई, हत्याओं का सिल सिला जारी !
मऊ। लगातार हो रही हत्या से मऊ जनपद थर्रा उठा है। हर तरफ दहशत कब किसके साथ संगीन घटना हो जाये कहना मुश्किल हो गया है। पुलिस ब्यवस्था से लोगों की आस्था समाप्त होतीं जा रही है।थानों में दलालों का बोलबाला है? सच कहीं कोई नही सुनने वाला है। आम आदमी हताश है ,निराश है? अपराध रूकने का नाम नही ले रहा है।अभी एक घटना का खुलाशा हुआ नहीं की दुसरा दहशत पैदा कर दे रहा है। अपराध का रोजाना रिकार्ड बना रहे है।बर्तमान सरकार में अपराध का ग्राफ लगातार बढ रहा है, हत्या, बलात्कार, चोरी, छिनैती, राहजनी, पत्रकारों के साथ बदसलूकी , लूट , आम बात हो गयी है। थानो पर न्याय बिक रहा है । खुल्लम-खुल्ला भरष्टाचार आट्टाहास कर रहा है। इन्सानियत हैवानियत की गुलाम होती जा रही है। मानवता मर्माहत है,आस्था आहत है। सरकार चाहे जितने भी कसीदे पढ ले लेकीन कानून ब्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गयी है। जनता अपराधियो के दहशत से घबरा गयी है। न बैक में पैसा सुरक्षित है न घर आम आदमी सुरक्षित है। अपराधियो के लिये दिन हो या रात अपराध आरक्षित है।सियासी सफरनामा चाहे जिस भी तरह सफर कर रहा हो लेकीन लोगों की जिन्दगी का सफर तो मुश्किल से सफर कर रहा है। कमर तोङ महगाई ,गावों मे बर्बाद हो रही है अवारा पशुओ से किसानो की कमाई? कभी अनाबृष्टी तो कभी अतिबृष्टी की मार झेलकर देश का अन्नदाता नहीं कर पा रहा है बैंक कर्ज की भरपाई?। भरष्टाचार की मार से बेहाल आम आदमी सशंकीत है, अचम्भित है, सरकारी फरमान सुन कर, वहीं लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ कहा जाने वाला समाज का सजग प्रहरी पत्रकार भी इस सरकार में तबाही का कर रहा है सामना? पुलिस का अत्याचार दुर्व्यवहार, फर्जी मुकदमो मे फँसाने का रोज छप रहा है समाचार !हर तरफ हाहाकार मुस्करा रहें है चाटुकार, खतरे में पङ गया है कलम का सच्चा सिपाही पत्रकार!कहने को तो योगी सरकार का ऐलान है किसी पत्रकार के साथ घटना हुयी तो जिम्मेदार पुलिस कप्तान है? लेकीन यह सब हवा हवाई फरमान है?,न कहीं धरातल पर है,न कहीं इसका सम्मान है।लगातार पुलिस ऊत्पीङन के साथ ही फर्जी मुकदमो मे फँसाने का क्रम जारी है पहले की सरकारों मे यह यदा कदा सुनी जातीं बिमारी थी लेकीन इस सरकार में तो यह बिमारी बन गयी महामारी है।अब तक सैकङो पत्रकार पुलिसीया ताङंव के शिकार हो गये कीतनो की हत्या हो गयी कितने बिना अपराध जेल मे सिसक रहे है। पूर्वांचल के जनपदों मे बेलगाम होती पुलिस ब्यवस्था का शिकार बन रहा है पत्रकार ? आये दिन कहीं न कहीं पुलिस प्रताड़ना की खबरआ रही है।अभी मीरजापुर गोरख पूर देवरीया कुशी नगर जौन पुर सहित तमाम जनपदों का मामला चल ही रहा था, तब तक मऊ में बाराणसी से प्रकाशित एक दैनिक पेपर के ब्यूरो चीफ को रात में पुलिस द्वारा हत्या का प्रयास किया गया जिसको लेकर आज पत्रकार आन्दोलित है। यह तो महज बानगी है।मजाल क्या कि कोई भरष्टाचार के खिलाफ समाचार लिख दे? जिसने भी हिमाकत की उसका अन्जाम बुरा हुआ। कलम से सच लिखने का खामियाजा तो इस सरकार में सैकङो भुगत रहे है। बदलते परिवेश में जहां भरष्टाचार का पोषण वर्दी में हो रहा है आज हालात इस कदर बिगङा है कि पूरा जनमानस रो रहा है। कानून के रखवालो की निरंकुशता आजादी की सम्प्रभुता पर लगातार कुठाराघात करने मे गूरेज नहीं कर रहा है।बर्तमान सरकार में कानून ब्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त है। पब्लिक तबाह है अपराधी मस्त है? यूँ तो शहर बाजार गांव गिराव में चर्चा शुरू हो गयी है की सियासत के आसमान पर चमकने वाला सियासी सूरज का सन्ध्या काल आ गया होने वाला अस्त है?। हर तरफ बिनाश कारी ब्यवस्था गायब हो रही शान्ती और आपसी समरसता।जिधर देखिये अपराधियो का बोलबाला पानी महँगा खून हो गया है सस्ता?।ब्रिटानिया हूकुमत का हो रहा है चारो तरफ आभास हर आदमी सदमे में हर कोई है निराश?।
चाहे ग्रामीण इलाका हो या शहरी? चौतरफा छाया है अन्धेरा दर्द भरी कराहती आती है रोजाना भोरहरी।?।मानवीय सम्बेदना बर्तमान ब्यवस्था में कारूणिक बेदना का शिकार हो रही है।निरसता का आवरण बिवसता के सानिध्य में सिसक रहा है। दलाल और लुटेरों का सामराज्य स्थापित हो गया है।कदम कदम पर धोखा है फीर भी सरकार का काम चोखा है।वास्तविकता के सतह पर गम्भीरता से निर्णय की क्षमता बिषमता के भयावह जहरीले बिषाक्त सियासी बर्षात में भीग कर बेदम हो चुका है। महज ढपोर शंखी बाते सुन सुनकर अब कुंठित होती आस्था बिवसता में अपनी सोच पर आंसू बहा रही है। जब जब पूर्ण सत्ता से सुसज्जित सियासत की ताज पोशी हुयी है तब तब लोकतान्त्रिक आस्था पर प्रहार हुआ है। इसका इतिहास गवाह है। उथल पुथल जन संहार दुराचार ,अत्याचार ,का बोल बाला कायम रहा है। लेकीन जब ब्यवस्था बदली और बदलाव के काले बादल छाये तो ऐसी सरकारों का अधोपतन हो गया? फीर कभी वजूद में नही आयी। रोजाना बदल रहे माहौल में अत्याचार की ईबारत को लोग हिकारत की नजर से देख रहें है। अगर यही क्रम बना रहा तो जिस भ्रम में सरकार मुगालता पाल रखी है वह ऊसके बूरे दिन का भयावह मंजर लिये धीरे धीरे करीब आता जा रहा है। जो निश्चित रूप से परिवर्तन का सियासी नर्तन करेगा?जब जब चौथे स्तम्भ पर ठोकर लगी है लोकतन्त्र का सियासी महल धाराशायी हुआ है।वक्त का रथ तेजी से मन्जिल के तरफ दौङ रहा है? देखना है कल कौन सा गुल खिलाता है ?अट्टाहास करता है या मुस्कराता है?।
रिपोर्ट - पिंटू सिंह


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