सिमट रही फाग लोकगीत की परम्परा
रतसर (बलिया)फाल्गुन माह में गूंजने वाले फाग गीत अब समय के साथ धीमी पड़ने लगी है। पहले माह के शुरू होते ही गांव के चौपाल के साथ अन्य जगहों पर मंडलिया वाद्य यन्त्रों के साथ फाग गीत का रस फिजां में घोलते नजर आते थे। फाग की मधुर तान में मस्त होकर लोग घंटो झूमा करते थे। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में अब युवा पीढ़ी फाग गीतों की अपेक्षा डीजे पर बजने वाले कान फाड़ू, फिल्मी संगीत को पसंद करने लगी है। इस सिमटती हुई परम्परा को गांव में सहेजने का प्रयास पिछले कई सालों से कुछ मण्डलियां करती आ रही है। चारो ओर फाग गवैयों का मस्ती भरा शोर, स्वस्थ पारंपरिक लोकगीत लोगों के उत्साह को दोगुना कर देते है, पर अब समय के साथ फाग गीतों की परम्परा ही नही लुप्त हो रही है बल्कि एक पूरा जीवन शैली ही खत्म होने के कगार पर है। यहां अब भी एक-दो मण्डली इस परम्परा को जीवित रखने की कवायद में जूटी है। पहले फाल्गुन माह आते ही जगह-जगह पर फाग गीतों के लिए अलग व्यवस्था की जाती थी। शाम ढलते ही ढोलक की थाप पर लोगों को घर से निकलने के लिए विवश कर देते थे। साथ मिल बैठकर पारंपरिक फाग गीतों की ऐसी महफिल जमती थी कि राह चलने वाले भी कुछ पल ठहर कर इस मस्ती भरे पल को अपने जेहन में उतार लेना चाहते थे। इस बारे में फाग गायक सिद्धनाथ पाण्डेय का कहना है कि फाग गायकी के प्रति नई पीढ़ी में कोई रुझान नही है, यह चिंता की बात है। अगर ऐसी स्थिति रही तो आने वाले समय में यह परम्परा यहां से लुप्त हो सकती है। कस्बा निवासी अध्यात्मवेता पं० भरत पाण्डेय ने बताया कि फगुआ गायन में विशेषकर चौताल, द्रुत तीन ताल, दादरा, कहरवा का अलग ही आनन्द रहता है। जब वादक द्रुत गति से ढोलक पर अपनी उंगली और हथेली चलाते है। और झांझ-मंजीरे की खनक गुंजती है तो लोग बरवस ही झुमने पर मजबूर हो जाते है। बुजुर्ग शिक्षक श्रीकान्त पाण्डेय ने बताया कि इस परम्परा को अगर संरक्षित नही किया गया तो यह भविष्य में केवल इतिहास बनकर रह जाएगा। भारतीय संस्कृति में फाल्गुन को उमंग और उल्लास का माह माना गया है। इस माह के अलग लोकगीत भी है। ढोलक वादक राकेश पाण्डेय का कहना है कि अफसोस इस बात का है कि अब यह विलुप्त हो चला है I इस परम्परा को अगर संरक्षित नही किया गया तो भविष्य में यह केवल इतिहास बनकर रह जाएगा।
रिपोर्ट : धनेश पाण्डेय

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