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ददरी मेला विशेष : तब बैलगाड़ी से निकलता था कारवां


रतसर (बलिया) भृगु मुनि की पावन तपोस्थली पर उनके शिष्य दर्दर मुनि के नाम पर प्रति वर्ष लगने वाला ददरी मेला प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध है। ददरी मेला का आयोजन पूर्णिमा स्नान के बाद से ही शुरु हो जाता है। लेकिन इस साल लगने वाला एतिहासिक ददरी ददरी मेला का स्वरूप इस बार अलग होगा । मेले में कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित नही होगा। स्नान से लेकर पशु मेले व मीना बाजार तक पर कोरोना का असर होगा। जिला प्रशासन ने बड़ी मुश्किल से मेले के आयोजन की अनुमति दी है। वो भी महज सात दिनों के लिए। जिलाधिकारी श्री हरिप्रताप शाही ने कहा है कि कोविड -19 मामलो में हो रही वृद्धि और इसी बीच 29 व 30 नवम्बर को कार्तिक पूर्णिमा का मुख्य स्नान पर्व व ददरी मेला को देखते हुए जिला प्रशासन गंभीर है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन काफी संख्या में लोग शहर होते हुए गंगा नदी में स्नान को जाते है। वहीं एक सप्ताह तक ददरी मेला भी चलेगा।

ददरी मेले का जलवा उस समय कुछ ज्यादा ही था जब आवागमन के साधनों की कमी थी तथा सड़कें की कम थी। उस समय लोग बाग पैदल या बैलगाड़ी से अपने बाल बच्चों के साथ गठरी मोटरी आटा सत्तू आदि सामानों के साथ अक्षय नवमी के दिन ही घर से चल देते थे। उस समय जनपद के दूर दराज इलाकों से आने वाली बैलगाड़ियों व लोगों का काफिला मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता था। स्नान करने वालों का हुजूम भी एक लघु मेले का रुप धारण कर लेता था। बड़े बुजुर्गो के संस्मरण आज भी लोगों के जेहन में रोमांच भर देते है।


आचार्य भरत पाण्डेय का कहना है कि उस समय और अब में बहुत फर्क आ गया है। उस समय लोगों के बीच आपसी प्रेम सौहार्द व भाई चारा था जो स्नान के समय भी दिखता था। अब वैसा नही दिखता। महिलाएं पैदल ही 'करबो जरूर हो भृगु मुनि दर्शन' आदि लोकगीतों को गाती हुई स्नान के लिए जाती थी। उस समय जनपद के चारो तरफ से बैलगाड़ियों का काफिला शहर से दुर हनुमानगंज, फेफना, शंकरपुर आदि चट्टियों पर रुकता था। स्नान करने वालो का यह हुजूम लघु मेले का रुप ले लेता था तथा कई दिन तक रुकता था। मेले से वापसी के समय भी लोग इन चट्टियों पर रुकते थे।


पूर्व शिक्षक श्रीकान्त पाण्डेय का कहना है कि उस समय मेले में जनपद के प्रत्येक क्षेत्र के मशहूर हस्तशिल्प सहित अन्य दुकानें भी लगती थी जिसे लोग काफी पसन्द करते थे। उस समय सहतवार कस्बे से पालकी, बैरिया से चमौधे तक जूतों की दुकान, तुर्तीपार से पीतल के वर्तन, हनुमानगंज का सिहोंरा, मनियर की बिंदी, रतसर की पापड़ी, रसड़ा से मिट्टी के वर्तन व खिलौनों की दुकान, करम्मर से हथकरघे द्वारा तैयार कपड़े आदि की दुकान लगती थी।इन दुकानों की साज सज्जा ऐसी होती थी कि जो जनपद के औद्योगिक विकास का बोध कराती थी। अन्य प्रान्तों से भी बड़ी संख्या में दुकानें आती थी। 


झंगही निवासी कृपाशंकर तिवारी का कहना है कि मनोरंजन के जो साधन उस समय प्रयुक्त होते थे वे सभी इस मेले में मिलते थे। इसके अलावा नौटंकी, ड्रामा, दंगल, सर्कस, गायन, वादन की टीमें भी मेले को शबाब पर पहुंचाती थी। 


साहित्यिक संस्था निर्झर के संयोजक धनेश पाण्डेय का कहना है कि कभी सन्तों का प्रवचन भी मेले की प्रमुख पहचान थी। 2000 में सन्तों के प्रयास से धार्मिक सतसंग प्रवचन और गंगा आरती शुरु हुई। समय के साथ साथ गंगा सरयु का संगम स्थल परिवर्तित होता रहा। और मेला भी शहर की तरफ बढता गया। साथ ही इसका भौतिक स्वरूप भी बदल गया। अब भौतिक चकाचौंध में मेला पूरी तरह रंगा रहता है। अब मेले में आयी सामग्री और खरीद बिक्री भी वक्त के मुताबिक होने लगी है।


रिपोर्ट : धनेश पाण्डेय

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