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मकर संक्रांति विशेष : मकर संक्रान्ति पर गांव में नहीं दिखती बहंगी


रतसर(बलिया) विविधता में एकता भारतीय संस्कृति की पहचान है। भारतीय संस्कृति पर्यावरण से प्रभावित है। सूर्य सभी राशियों को किसी न किसी रुप में प्रभावित करते है। लेकिन कर्क व मकर राशि में सूर्य का आना विशेष महत्व रखता है। पौष मास में जैसे ही सूर्य शीत की जड़ता को कुछ कम करते है और मकर राशि में प्रवेश करते है तो मकर संक्रान्ति की धूम होती है। आज से ही शिशिर ऋतु का प्रारंभ एवं खरमास समाप्त हो जाता है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाते है जो इस बात का संकेत होता है कि अब दिन बड़ा व रात छोटी होने लगेगी। सूर्य की यह संक्रमण क्रिया 6 -6 मास में होती है। दक्षिणायन रहने से रात बड़ी दिन छोटे होते है। 




महाभारत में भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही देह त्याग किया था। मकर संक्रान्ति का पर्व पूरे हिन्दुस्तान में विभिन्न नामों से मनाया जाता है। इसे सूर्य उपासना का प्रसिद्ध व बड़ा पर्व माना जाता है। दक्षिण भारत में पोंगल आसाम में बिहु तथा बंगाल में संक्रान्ति के नाम से जबकि इस क्षेत्र में खिचड़ी के नाम से जाना जाता है। इस पर्व के बारे में अध्यात्मवेता आचार्य पं० भरत पाण्डेय ने बताया कि सूर्य पूजा हमारे जीवन में गहराई से जुड़ा है। वेदों तथा ज्योतिष विज्ञान में सूर्य का विशिष्ट स्थान है। मकर संक्रान्ति का पर्व ज्यादातर प्रत्येक वर्ष 14 जनवरी को ही पड़ता है। इस वर्ष भी यह पर्व 14 जनवरी को ही मनाया जाएगा। इस दिन गंगोत्री से गंगासागर तक सर्वत्र गंगा नदी में स्नान करने का पूण्य फलदायक विधान है। गंगा स्नान के साथ ही गुड़, तिल, चावल आदि का दान विशेष फलदायक माना गया है। तिल, गुड़, घी, काली उड़द के सेवन के पीछे भी वैज्ञानिक आधार है। खिचड़ी को जन स्वास्थ्य के लिए फायदेमन्द माना गया है वहीं इन पदार्थों में शीत को शान्त करने की अद्भुत क्षमता है।


मकर संक्रान्ति पर गांव में नही दिखती बहंगी ...


गांव हो या शहर इस त्योहार पर एक प्रभा लम्बे समय से चली आ रही है। वह है विवाहित बिटिया या बहु को बहंगी से खिचड़ी भेजने की प्रथा। आधुनिकता में यह प्रथा अब लुप्त होने के कगार पर है। पहले गांव में दूर-दराज से बड़े-बड़े दौड़ा में तिलवा, लाई, चिउरा,गुड़ आदि अन्य सामग्री लेकर मकर संक्रान्ति के कुछ दिन पहले से ही मजदूर दिख जाया करते थे। अब वह नजारा अब गांव से गायब है। इसे सम्बन्धों को दुरियां कहे या आधुनिक मानसिकता। अब उसके स्थान पर मोबाइल के द्वारा हाय, हैलो के साथ कुछ संदेश एक दुसरे को सोशल साइट के माध्यम से भेज दिया जा रहा है। हर त्योहार पर एक दुसरे के लिए मंगलकामना कर ली जा रही है।


रिपोर्ट : धनेश पाण्डेय

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