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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष : बेहतर समाज बनाने को समर्पित आशा संगिनी : प्रियंका देवी

 


रिपोर्ट : धीरज सिंह


बलिया : पढ़ी लिखी होते हुए भी समाज की कुछ कुरीतियों और परंपरागत सोंच के कारण आशा संगिनी प्रियंका देवी अपने बच्चों व परिवार के लिए कुछ कर नहीं पा रही थी । प्रियंका में अपने परिवार और समाज का जीवन स्तर बेहतर बनाने की प्रबल इच्छा थी । वह बहुत कुछ करना चाहती हैं । 

बलिया से करीब 40 किलो मीटर दूर ग्राम सभा टेगंरही ब्लाक बैरिया गाँव में रहने वाली प्रियंका देवी का, जो एक मध्यम वर्गीय परिवार से हैं। प्रियंका बताती हैं कि वर्ष 2006 में उन्हें आशाओं के चयन की जानकारी हुयी, घर वालों से जब इसके लिए बात किया, तो उन्होंने समाज और लोग क्या कहेंगे कहकर मना कर दिया। लेकिन पति जो पेशे से वकील हैं, को काफी समझाने और कई कामकाजी महिलाओं का उदाहरण देने के बाद पति के साथ घर के अन्य लोग भी तैयार हो गए।

प्रियंका बताती हैं कि उनका चयन आशा कार्यकर्ता के रूप में हो गया । ऐसे में जब आगे बढ़कर कुछ करने का मौका मिला, तो दृढ़ निश्चय किया कि घर-परिवार और गाँव की हालत बदल कर रहेंगी । उन्होने काम शुरु किया, तो सामने समाज की अशिक्षा, गरीबी, जाति भेदभाव, लोगों में जागरुकता की कमी, महिलाओं की स्वास्थ्य के प्रति उदासीनता, अंधविश्वास, टीकाकरण न कराना, घर पर प्रसव को पसंद करने जैसी बड़ी चुनौतियाँ थीं। सबसे पहले साफ़-सफाई के बारे में गाँव वालों को जागरुक किया।जब थोड़ा बदलाव आया, तो मेहनत सफल होती दिखी।अगले कदम के रूप में मैंने अपने कार्यक्षेत्र टेंगरही, जगदेवा में स्वास्थ्य शिविर का आयोजन कर लोगों को टीकाकरण का महत्व समझाया। पहली बार शिविर के लिए घर-घर जाकर लोगों को इकठ्ठा किया। निरंतर प्रयास करते रहने से अब प्रत्येक बुधवार और शनिवार को आयोजित होने वाले ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता एवं पोषण दिवस (वीएचएसएनडी) व अन्य शिविरों में लोग खुद भी पहुँचने लगे हैं। जहाँ से सभी के स्वास्थ्य की जाँच, बच्चों को टीके, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं को सेहत की बाते बताने में आसानी हुयी है।

सूझबूझ से बचाई माँ-बच्चे की जान – 

प्रियंका बताती हैं कि पिछले वर्ष उनके कार्यक्षेत्र में महिला गर्भवती हुयी, जो मंदबुद्धि थी। न तो उसे और न ही घर वालों को उसके गर्भवती होने की जानकारी हुयी।गर्भावस्था के पहले-दूसरे महीने में वह महिला अपने मायके चली गयी, जिस वजह से उसकी जरूरी जांचें नहीं हो पायीं और बच्चा ख़राब हो गया | इसकी जानकारी जब मुझे मिली, तो बहुत दुःख हुआ। जब वह महिला दोबारा गर्भवती हुयी, तो उसके पति और जिठानी को बार-बार प्रेरित कर उसकी प्रसव पूर्व की चार जांचें करवाई, हीमोग्लोबिन कम होने पर आयरन-सुक्रोज चढ़वाया और आयरन-फोलिक एसिड गोली का सेवन कराने के लिए उसका नियमित फॉलोअप किया। उस महिला का प्रसव पिछले माह फ़रवरी में महिला अस्पताल में हुआ। जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ हैं।हमें बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है हमारे गांव के आस - पास बाढ़ भी आ जाती है बाढ़ में नाव के सहारे में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कोटवा पर आसपास के उप केंद्र पर महिलाओं को टीकाकरण और डिलीवरी कराने के लिए ले जाती हैं ।  


आशाओं के माध्यम से

वह बताती हैं कि उनके कार्यक्षेत्र टेगंरही, जगदेवा, बलिहार  मोहल्ले में कुछ परिवार ऐसे थे, जो अपने बच्चों को टीका लगवाने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं होते थे। उनका कहना था कि हमारे घर-परिवार में अभी तक किसी को टीका नहीं लगा है और सभी लोग ठीक हैं। हम अपने बच्चों को टीका नहीं लगवायेंगे | ऐसे में मैंने उन परिवारों का लगभग दो सालों तक नियमित फॉलोअप किया, उन्हें टीकाकरण कराने से होने वाले फायदों और न कराने से होने वाली जानलेवा बीमारियों के बारे में बताया, उनके सामने आसपास के दूसरे बच्चों की मिशाल रखी, जिन्हें टीका लगा और वह पूरी तरह स्वस्थ हैं। आज नतीजा यह है कि लगभग सभी परिवार अपने बच्चों को टीका लगवाने के लिए सत्र स्थल पर खुद पहुँचते हैं। पिछले वर्ष हमारे करोना महामारी मार्च में आई उसमें मैं अपने गांव और आसपास के लोगों को जागरूक करते हुए बाहर से आए । व्यक्तियों का सूची बनाकर कोरोना की जांच एवं सर्वे कराया । प्रतिदिन बाहर से आए व्यक्तियों को सूची उनको  होम आइसोलेशन एवं होम कोरेंटाइन कराना समय-समय पर उनकी हाल चाल लेना यह प्राथमिकता हमारे लिए रहिए और हमारे लिए लड़ाई भी थी करोना को हम लोग हर हाल में अपने देश अपने गांव अपने गली मोहल्ले से हराकर भेजेंगे और उसमें हम यथा शीघ्र ही विजय पाए और कोरोना को मात दिया गया। अभी हाल में पिछले महीने मेरे ब्लॉक को जो लक्ष्य था कि पुरुष नसबंदी आपका बहुत कम है । वह हमारे बीसीपीएम साहब के आदेशानुसार मैं पुरुष नसबंदी चार करा कर जिले का नाम प्रथम स्थान रखी । एचबीएनसी के दौरान महिला को बच्चे को रख-रखाव, खान-पान, साफ सफाई, के बारे में भी जानकारी देते हुए संस्थागत प्रसव की सलाह फैमिली प्लानिंग संबंधित सारी जानकारियां को अवगत कराती रहती हूं ।


स्वास्थ्य आंकड़ों में आई सुधार – 

बीसीपीएम संजय यादव का कहना है कि प्रियंका के प्रयास और सहयोगात्मक पर्यवेक्षण से उनके कार्यक्षेत्र के स्वास्थ्य आंकड़ों में बेहद सुधार आई है । पहले जहाँ 39 फ़ीसदी गर्भवती महिलाओं का ही चिन्हांकन हो पता था, वह अब बढ़कर 61 फ़ीसदी तक पहुँच गया है । शून्य से 2 वर्ष तक के बच्चों का टीकाकरण की दर 25 से बढ़कर 51 फ़ीसदी, संस्थागत प्रसव 25 से बढ़कर 37, पूर्ण प्रतिरक्षण 35 से बढ़कर 50 हुआ है । इसके अलावा पहले जहाँ 10 प्रतिरोधी परिवार टीकाकरण नहीं करवाते थे, वहीं अब 8 प्रतिरोधी परिवार टीकाकरण कराने लगे हैं ।इसी प्रकार महिल व पुरुष नसबंदी में इनका बहुत सहयोग रहा है


मेहनत लायी रंग – 

मेहनत रंग लायी और टेगंरही  बलिहार ,जगदेवा , उपकेन्द्र की 17 आशा कार्यकर्ताओं की सहयोगी पर्यवेक्षक बनाते हुए विभाग द्वारा वर्ष 2016 में मुझे आशा संगिनी पद की जिम्मेदारी सौंपी गयी । काम के प्रति लग्न और मेहनत देखकर । कोरोना काल में बेहतर प्रदर्शन के लिए भी उन्हें  बैरिया ब्लॉक की में प्रथम स्थान के पुरस्कार से सम्मनित किया गया और  पुरुष नसबंदी के लिए मुझे अपने बैरिया ब्लॉक के प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर प्रेम प्रकाश यादव, बीपीएम बीसीपीएम के द्वारा सम्मानित किया गया ।अब इस कार्य के लिए मुझे गांव और आसपास के लोगों के द्वारा सम्मान और इज्जत मिलता है और मुझे भी बहुत खुशी होती है ।

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