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न्याय व मर्यादा के प्रतीक है भगवान परशुराम:- लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी





दुबहर:-विषम परिस्थितियों में भी अपनी नैतिकता का परित्याग नहीं करना चाहिए। जिस यज्ञ में दान ,दक्षिणा की व्यवस्था नहीं है वह फलित नहीं होता है। अपने साधन और सामर्थ्य को समाज व राष्ट्र के हित में उपयोग करना चाहिए। उक्त बातें महान मनीषी सन्त त्रिदण्डी स्वामी जी महाराज के कृपा पात्र शिष्य लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने क्षेत्र के जनेश्वर मिश्रा सेतु एप्रोच  मार्ग के निकट हो रहे चातुर्मास व्रत में अपने प्रवचन के दौरान रविवार की देर शाम कही।

 उन्होंने कहा की संत,ईश्वर,एवं संस्कृति दुराग्रह के विषय नहीं होते हैं। उन्होंने बतलाया कि घर में धन संपत्ति का आगमन होना गृहस्थ का प्रथम सुख है।निरोग होना दूसरा सुख, सुंदर पत्नी होना तीसरा सुख, पत्नी का वाणी व्यवहार अच्छा होना चौथा सुख, पुत्र आज्ञाकारी व वश में होना चाहिए यह पांचवा  सुख है। घर में अच्छी शिक्षा का होना छठवां सुख है।भगवान परशुराम जी के प्रसंग की कथा सुनाते हुए स्वामी जी ने कहा कि मर्यादा, न्याय, नीति की स्थापना के लिए ही भगवान परशुराम धरा धाम पर आए। जब मर्यादाहीन राजाओं द्वारा पृथ्वी पर अत्याचार किया जाने लगा तब भगवान परशुराम धरती पर अवतरित हो कर उन मर्यादाहीन राजाओं को दंडित कर मर्यादा, नीति व न्याय को पुनर्जीवित किए। भगवान परशुराम का अवतार दस अवतारों में प्रमुख माना जाता है। भगवान परशुराम का स्मरण करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है।

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सत्संग पंडाल में सायंकालीन प्रवचन से पूर्व चातुर्मास व्रत-समिति की बैठक लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी के संरक्षकतत्व मे हुई। जिसमें यज्ञ समिति के सचिव एवं प्रदेश के परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि चातुर्मास के समापन पर होने वाले लक्ष्मीनारायण महायज्ञ ऐतिहासिक होगा इसमें उत्तर प्रदेश तथा बिहार के अलावे अन्य जनपदों से भी समागम में लाखों भक्तगण शामिल होंगे। उन्होंने यूपी-बिहार के लोगों से आग्रह किया कि इस महायज्ञ को ऐतिहासिक बनाना होगा, जिसके लिए सभी श्रद्धालु तन- मन- धन से महायज्ञ में अपना सहयोग करें। इस मौके पर यज्ञ- समिति के पदाधिकारीगण, सदस्यगण एवं जनपद के कोने-कोने से हाये हजारों श्रद्धालुगण मौजूद रहे।

रिपोर्ट:-नितेश पाठक

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