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श्रीमद् भागवत महापुराण की कथा श्रवण करने से मिलता है सभी तीर्थों का पुण्य :- लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी




दुबहर । मनुष्य जब धरती पर जन्म लेता है तो वह तीन ऋणों से बंध जाता है पहला मातृ पितृ ऋण ,दूसरा ऋषि ऋण तीसरा देव ऋण इसलिए प्रत्येक संसारी पुरुष को अपने जीवन काल में इन दिनों तीनो ऋणों को पूरा करना चाहिए । मातृ पितृ ऋण संतान को जन्म देकर उसे संस्कार देने से पूर्ण हो जाता है । दूसरा ऋषि ऋण संतों की सेवा साधना में सहयोग करने से मुक्ति मिलती है ,वही देव ऋण के लिए यज्ञ तप आदि का आयोजन होते रहना चाहिए । उक्त बातें क्षेत्र में हो रहे चातुर्मास व्रत के दौरान रविवार की देर शाम संत लक्ष्मी प्रपन्न जियर स्वामी जी महाराज ने श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा के दौरान कहीं । उन्होंने कथा में बतलाया कि भगवान के अनंत अवतार हैं जिसमें 108 अवतार मुख्य माने गए हैं उन्होंने भगवान के प्रथम अवतार आदिदेव नारायण ,दूसरा सनक सनंदन सनातन एवं सनत कुमार, तीसरा वराह अवतार चौथा नर और नारायण का अवतार पांचवा कपिल अवतार को बताते हुए उनके एक एक अवतार की विस्तृत रूप से व्याख्या की और उपस्थित श्रोताओं को इसके विषय में समझाया । कहा कि बार-बार सत्कर्म सत्संग करने से मनुष्य की चंचल वृत्तीया समाप्त हो जाती हैं ।  भगवान के कृष्ण अवतार की चर्चा करते हुए कहा कि यह अवतार कृपा का अवतार है । जिसमें भगवान बिना पात्रता देखे हुए भक्तों पर सब कुछ निछावर कर देते हैं समझाया कि भगवान ने जो गति माता यशोदा को प्रदान किया वही गति उन्होंने पूतना को भी प्रदान किया । जबकि पूतना भगवान के प्राण को हरने आई थी इसलिए कृष्णा अवतार को कृपा का अवतार कहा गया है । इस अवतार में भगवान कृष्ण ने अनेक लोगों पर कृपा किया अनेक लोगों का उद्धार किया । पच्चास हजार  वर्ष पुरानी हमारी वैदिक परंपरा है। उन्होंने कहा कि चौबीस वा अवतार भगवान का कल्कि अवतार होगा। उन्होंने बतलाया कि श्रीमद्भागवत की कथा श्रवण करने के बाद जीवन में कोई भी तीर्थ शेष नही रह जाता है।  क्योंकि महापुराण की कथा सुनने से सभी तीर्थों का पुण्य प्राप्त हो जाता है।

रिपोर्ट:-नितेश पाठक

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