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दूसरो का मंगल करना ही मंगलाचरण:- जीयर स्वामी


दुबहर : सुकदेव जी महाराज ने बताया कि मंगलाचरण का मतलब होता है मंगल करना। जैसे की किसी का विवाह हो रहा हो उसकी भूत, भविष्य, वर्तमान की कामना करना ही मंगलाचरण है। इसके लिए पितरों को गीत गाकर, ऋषियों को, भगवान को, देवताओं को गोहराना ही मंगलाचरण होता है। इसी प्रकार श्री शुकदेवजी ने भी बाद में मंगलाचरण किया कि जो मै कह रहा हूं उससे समाज में परिवार में जो सुनने वाला हो उसका मंगल हो। इसीलिए मंगलाचरण किया जाता है। चाहे भजन के रूप में हो स्तुति के रूप में हो।

उक्त बातें भारत के महान मनीषी संत त्रिदंडी स्वामी जी महाराज के कृपा पात्र शिष्य श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने जनेश्वर मिश्रा सेतु एप्रोच मार्ग के निकट हो रहे चातुर्मास व्रत में अपने प्रवचन के दौरान कही। 

शुकदेवजी ने परिक्षित को बताया कि जो अच्छे सदाचारी ब्राम्हण हो उसे भगवान का मुख बताया गया है। भगवान के मुख का पूजा करने का मतलब अग्नि का पूजन। स्वास  भगवान की वायु है।  भगवान के नेत्र के ध्यान का मतलब अंतरिक्ष का ध्यान कर लिया।  भगवान के पैर के तलवे को ध्यान करते हुए यह मानना चाहिए कि यह पताल लोक है। पैर के अग्र भाग रसातल लोक, दोनो एडी का ध्यान का मतलब महातल का दर्शन, जांघो के ध्यान का मतलब महीतल लोक का दर्शन। दोनो पेंडुली का दर्शन परासर लोक की पूजा, घुटनों का दर्शन सुतल लोक का दर्शन, नाभी का दर्शन करने का मतलब हमने आकाश का, भगवान के वक्षस्थल का पूजा करने का मतलब स्वर्गलोक का दर्शन कर लिया। मुख का दर्शन करने का मतलब जन लोक, ललाट का दर्शन करने का मतलब तपोलोक का दर्शन, सिरोभाग का दर्शन सत् लोक है। भगवान की भुजा की पूजा करने का मतलब इन्द्र की, कान का ध्यान करने का मतलब दिशा का पूजन, इस प्रकार भगवान के अंगो का ध्यान करने से अलग अलग लोकों के परिक्रमा करने का फल प्राप्त होता है। यदि सारे दुनिया के तीर्थ व्रत देवी देवता की पूजा करने की क्षमता नही है तो केवल एक मात्र भगवान नारायण की पूजा कर लिया तो तैंतीस कोटि देवता व  सभी देवताओं को सातों लोक की अराधना कर लिया।



रिपोर्ट:- नितेश पाठक

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