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हिन्दी पत्रकारिता दिवस : लोक कल्याण की भावना ही पत्रकारिता का मूल उद्देश्य : धनेश

 


➡️ आखिर मीडिया भी तो हमारे समाज का ही एक हिस्सा है


गड़वार (बलिया) पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का नाम अनायास ही नही मिला। बल्कि सामाजिक सरोकारों के प्रति पत्रकारिता के दायित्वों की महत्ता के दृष्टिगत समाज ने ही इसे यह स्थान प्रदान किया है। पत्रकारिता लोकतंत्र का अविभाज्य अंग बन चुकी है। लोक कल्याण की भावना ही पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है। पत्रकारिता जब तक अपने इसी उद्देश्य के तहत सामाजिक सराकारों के प्रति सार्थक भूमिका निभाती रहेगी तभी तक यह लोकतंत्र को सशक्त बनाने में अहम योगदान दे सकती है। इससे इतर न तो वह सामाजिक मूल्यों की रक्षा कर सकती है और न ही लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की भूमिका को सार्थक कर सकती है। हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाते समय हम सवालों से घिरे हैं और जवाब नदारद हैं। पं० जुगुलकिशोर शुकुल ने जब 30 मई,1826 को कोलकाता से उदंत मार्तण्ड की शुरुआत की तो अपने प्रथम संपादकीय में अपनी पत्रकारिता का उद्देश्य लिखते हुए शीर्षक दिया " हिन्दुस्तानियों के हित के हेत"। यही हमारी पत्रकारिता का मूल्य हमारे पुरखों ने तय किया था। आखिर क्यों हम पर इन दिनों सवालिया निशान लगा रहे हैं। हम भटके हैं या समाज बदल गया है ? मीडिया की इस घटती प्रतिष्ठा और विश्वसनियता के पीछे बहुत सारे कारण गिनाए जा सकते है। सबसे पहला तो यही है कि उदारीकरण की आंधी से पहले जिस मीडिया ने खुद को एक मिशन बनाए रखा था,उसमें व्यवसायिकता की चकाचौंध में बहुत तेजी से अपना " कारपोरेटाइजेशन" कर लिया और खुद को ' मिशन ' की बजाए खालिस  'प्रोफेशन' बना तो इसकी प्राथमिकताएं भी बदल गई। जन की जगह धन साध्य बन गया। अब आप याद कीजिए कि क्या कहीं आपने किसी देश,शहर या समाज में लोगों को इस बात के लिए इकट्ठा होकर कोई सामाजिक  आंदोलन या धरना प्रदर्शन करते देखा है कि अमुक पत्रकार को जेल से रिहा किया जाए या अमुक पत्रकार के हत्यारे को गिरफ्तार किया जाए या अमुक पत्रकार, जिसका अर्से से कोई अता-पता नहीं है,उसका पता लगाया जाए। और तो और जिन लोगों के हित के लिए पत्रकार ने अपनी जान जोखिम में डाली है,समाज उनके परिवार की मदद के लिए कभी खड़ा नजर नही आता। यही समाज जो पानी न आने पर सड़कें जाम कर देता है। किसी सैनिक के शहीद होने पर श्रद्धांजलि यात्राएं निकालता है। अपने अधिकारों के लिए या अपने शहीदों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए सड़कों पर आना कतई गलत नही है और न ही यहां इसका विरोध किया जा रहा है, बल्कि कहने का आशय यह है कि एक पत्रकार जब अपना फर्ज निभाते हुए मारा जाता है तो उसकी शहादत,उस समाज से भी बदले में कुछ चाहती है,जिसके लिए वह शहादत दी गई। बजाय इसके,हम उसके चरित्र पर सवाल उठाते है या उस पर हमले को जायज साबित करने की कोशिश करते हैं। कहने का आशय यह है कि अगर मीडिया और समाज के बीच विश्वास मिट रहा है,तो इसके लिए अकेले मीडिया को ही दोषी नही ठहराया जा सकता। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आखिर मीडिया भी तो हमारे समाज का ही एक हिस्सा है,जैसा समाज हमने बीते कुछ दशकों में बनाया है,यह कैसे मुमकिन है। इसलिए अगर मीडिया के प्रति लोगों में,समाज में,विश्वास की पुनर्बहाली करनी है तो दोनों स्तर पर प्रयास करना आवश्यक है।


रिपोर्ट : धनेश पाण्डेय

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