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स्यामंतक मणि की कथा के साथ सात दिवसीय भागवत कथा समाप्त






मनियर, बलिया। श्री बांके बिहारी पैलेस रानीपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा का अंतिम दिन भक्तिमय उत्साह से सम्पन्न हुआ। विगत 7 फरवरी से चल रही इस सात दिवसीय कथा का समापन आज शुक्रवार को हो गया। कथा व्यास सुनील पांडेय ने अंतिम दिन महाभारत एवं भागवत पुराण की प्रसिद्ध स्यामंतक मणि की पौराणिक कथा सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।कथा व्यास ने बताया कि सत्राजित भगवान सूर्य का परम भक्त था। घोर तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्य ने उसे स्यामंतक मणि प्रदान की। सत्राजित इसे लेकर द्वारिका पहुंचा। द्वारकाधीश श्रीकृष्ण ने मणि को राजा उग्रसेन को समर्पित करने का सुझाव दिया, किंतु सत्राजित ने अस्वीकार कर दिया। उसने मणि अपने भाई प्रसेन को दे दी। प्रसेन शिकार पर जंगल गया, जहां बाघ ने उसे मारकर मणि छीन ली। बाघ को ऋक्षराज जामवंत ने वध कर मणि अपनी पुत्री जामवंती को दे दी।प्रसेन के न लौटने पर सत्राजित ने श्रीकृष्ण पर आरोप लगाया कि उन्होंने उसके भाई की हत्या कराई। इससे श्रीकृष्ण पर हत्या कराने का कलंक लगा। कलंक धोने जंगल गए कृष्ण ने मृत प्रसेन, बाघ और बाघ के पदचिह्न देखे। वे जामवंत की गुफा पहुंचे, जहां जामवंती के पास मणि दिखी। मांगने पर जामवंत ने इनकार किया। तब 17 दिनों तक चला युद्ध, जिसमें 18वें दिन जामवंत पराजित हुए। उन्हें त्रेता युग की स्मृति हुई, जब भगवान राम ने द्वापर में युद्ध की भविष्यवाणी की थी। कृष्ण ने राम रूप में दर्शन दिए। जामवंत ने पुत्री जामवंती का विवाह कृष्ण से करा दिया।मणि लेकर द्वारिका लौटे कृष्ण को देख सत्राजित को अपराध बोध हुआ। उसने पुत्री सत्यभामा का विवाह कृष्ण से कराया। इसके अलावा कथा व्यास ने राजा नृग की कथा भी सुनाई,जो बहुत धन दौलत व गायें दान करते थे जो एक गलती से गिरगिट योनि प्राप्त हुए।श्रोताओं ने भक्ति रस का रसपान किया। कथा समापन पर दान-दक्षिणा प्रदान की गई। आयोजन ने क्षेत्रवासियों में धार्मिक जागरण पैदा किया।

मनु तिवारी

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