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संत,शास्त्र,ईश्वर व संस्कृति आस्था का विषय : जियर स्वामी


दुबहर, बलिया । जगत के प्रत्येक  जीव को अपने अपने भाग्य का प्रारब्ध तो हर हाल में भोगना ही पड़ता है । लेकिन पूजा पाठ यज्ञ तीर्थ  दान एवम अच्छे  कर्म से प्रारब्ध का प्रभाव कम हो जाता है। इसलिए अपने दिनचर्या में व्यक्ति को अच्छे कर्म करते रहना चाहिए। तभी जाकर उसका प्रारब्ध सुधरेगा। अहंकार बस लोग एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए नाना प्रकार के जतन करते हैं । हिंसा करते हैं ,अहंकार करते हैं जो उन्हें दिन प्रतिदिन नीचे ही गिराता जाता है । भगवान को मेवा ,मिश्री से अधिक अहंकार प्रिय है वह अहंकार का भोजन करते हैं । वह दुनिया में किसी का अहंकार रहने नहीं दिए । कहा की संत शास्त्र ईश्वर ,श्रद्धा विश्वास और जिज्ञासा के विषय हैं । इनकी परीक्षा नहीं लेनी चाहिए । जब-जब इनकी परीक्षा हुई है उसका फल अच्छा नहीं हुआ । उन्होंने भगवान कृष्ण की कथा सुनाते हुए मंगलवार की देर शाम को बताया कि जब भगवान कृष्ण के परिवार में उनके पुत्रों के अंदर अहंकार, आचरण में गड़बड़ी होने लगी तब उन्होंने अपने पुत्रों के साथ एक बार उनको समझाने के उद्देश्य से वन मे ले गये स्वयं एक वृक्ष के नीचे बैठे गए । उनके पुत्र वन में घूमने लगे घूमते घूमते एक कुएं के पास पहुंचे जिसमें पानी नहीं था उन्होंने देखा कि एक गिरगिट हुए में पड़ा है वह बार-बार ऊपर आने का प्रयास कर रहा है लेकिन आ नहीं पा रहा सभी लोग भगवान कृष्ण के पास पहुंचे और पूरी कहानी बताई भगवान  जब कुवें पास पहुंचे और एक लकड़ी के सहारे उस गिरगिट को निकालने का प्रयास किया ।  गिरगिट के भगवान के हाथ से स्पर्श होने मात्र से वह देव रूप में खड़ा होकर भगवान की स्तुति करने लगा । भगवान के पूछने पर उसने बताया कि मैं राजा नृग हूं मैं बहुत बड़ा दानी था मैं रोज असँख्य गायों का दान करता था एक दिन में दान कर रहा था तभी मेरी गायों में एक गिरहस्थी ब्राह्मण की गाय उसमे आकर मिल गई मैंने उस गाय को भी दान कर दिया । तभी वह ब्राह्मण खोजते हुए वहां आ पहुंचे दान लेने वाले ब्राह्मण गाय लेकर जा रहे थे । यह गाय मेरी है मेरी  है दोनों लोग मेरे पास आए मैंने दोनों लोगों से कहा इस गाय के बदले आप लोग अनेक गाय ले लीजिये । कोई माना नही ,मैंने अहंकार बस ब्रम्हामन से कह दिया है कि यह गाय भी मेरी ही होगी मैंने कभी दान ही किया होगा । क्रोधित ब्राह्मण ने श्राप दे दिया उसी श्राप की वजह से मैं गिरगिट बनकर इस कुएं में पढ़ा था । भगवान कृष्ण ने अपने पुत्रों को समझाया की अनजाने में हुई गलती का पाप इस महादानी राजा तो कितना भोगना पड़ा इससे तुम लोगों को शिक्षा लेनी चाहिए । कथा के अंत में भाव भावपूर्ण आरती के बाद सभी ने प्रसाद ग्रहण किया इस मौके पर मुख्य रूप से संत श्रीधर चौबे शिवजी पाठक अक्षयबर पांडे कमलेश सिंह सुनील सिंह जइ सिंह शशिकांत सिंह अरुण सिंह पिंटू सिंह विशाल प्रताप सिंह नीरज सिंह हैप्पी तिवारी सनी सिंह टुनटुन सिंह दीपक सिंह अशोक सिंह राधा कृष्ण पाठ राकेश पाठक पंचदेव दुबे  राधेश्याम दुबे पशुपति दुबे गामा सिंह गोलू सिंह आदि रहे ।



रिपोर्ट : नितेश पाठक

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