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संरक्षण के अभाव में विलुप्त हो रहा कुओं का अस्तित्व




रतसर (बलिया) ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के लिए शुद्ध पेयजल का मुख्य स्रोत रहे कुएं आज शासन की उपेक्षा के चलते विलुप्त होने के कगार पर है। अधिकतर गांवों में तो कुएं अब ढुढें नही मिलते, लेकिन जहां भी है कुड़े के ढेर से अटे पड़े है। जिम्मेदारों की उपेक्षा के चलते कुओं के अस्तित्व पर संकट है। शादी विवाह में पूजन से लेकर अन्य क्रिया कलाप कुओं के किनारे ही होते रहे है। तथा इसके किनारे उगने वाली घास हवन-पूजन में विशेष महत्व रखती है। सरकार द्वारा कुओं के सौन्दर्यीकरण की योजना बनाई गई, लेकिन वह सिर्फ कागजों तक ही सिमट कर रह गई। वैसे शादी विवाह के अवसर पर अधिकतर गांवों में कुएं ढुढने से नही मिलते तो ऐसे में प्रतीक रुप में कार्य सम्पन्न करा लिया जाता रहा है। इतिहास पर नजर डाले तो कुओं का अस्तित्व मानव सभ्यता के उदय के साथ से ही जुड़ा हुआ दिखाई देता है। यद्यपि कुएं की पहली प्राथमिकता व उपयोगिता लोगों की प्यास बुझाने की थी। कृषि एवं संस्कार कार्यक्रमों में भी इसकी उपयोगिता कम नही थी। किसी के घर में जब भी शादी समारोह पड़ता था तो लोग बारात विदा करते समय कुएं की फेरी लगाते थे। आज उन्हीं कुओं का अस्तित्व समाप्त होता जा रहा है। कुओं के अस्तित्व पर चिन्ता व्यक्त करते हुए राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक श्रीकान्त पाण्डेय बताते है कि आज लोग पानी उबाल कर पीने की सलाह देते है। एक समय वह भी था कि कुएं का पानी उबाल कर पीने की कोई आवश्यकता नही पड़ती थी। सूर्य की किरणों से इसका पानी खुद ब खुद पक जाता था जो पीने में मीठा एवं स्वास्थ्यवर्धक होता था। कुओं के अस्तित्व की रक्षा की ओर जनप्रतिनिधियों को भी गम्भीर होना चाहिए।


रिपोर्ट : धनेश पाण्डेय

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