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शांति के पथ पर चलकर ही प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है : विद्यार्थी



*दुबहर, बलिया:--* मानव को शांत जीवन जीने के लिए व्यर्थ की कल्पनाओं को त्याग कर देना चाहिए। व्यर्थ की कल्पनाएं मन को अशांत करती हैं। सांप्रदायिक भावनाओं का हमारे संस्कृति में कोई स्थान नहीं है। संकीर्ण विचारधारा के लोग अभिमान एवं सांप्रदायिक भावना को अपने संस्कृति में अंगीकार करते हैं। इतिहास गवाह है हमारा देश अंतरंग रूप से वसुधैव कुटुंबकम् को स्वीकार करता है। यही वसुधैव कुटुंबकम् विश्व शांति का मूल मंत्र है। युक्त उद्गार सामाजिक चिंतक एवं गीतकार बब्बन विद्यार्थी ने विश्व शांति दिवस के अवसर पर पत्रकारों से बातचीत के दौरान व्यक्त किया।

श्री विद्यार्थी ने कहा कि- पड़ोसी की खुशी, गम, चिंता, कठिनाई में अपने को शामिल करना विश्व शांति दिवस का सबसे बड़ा संदेश है। विश्व का हर मानव शांति चाहता है। परंतु वह इसके लिए प्रयास नहीं करता। अशांति के लिए कभी भी कोई एक पक्ष जिम्मेदार नहीं होता है। अगर कहीं शांति है तो उसका श्रेय सभी पक्षों को जाता है। आज समाज में यदि दूसरे के प्रति घृणा नहीं होती, तो शायद किसी को दुःख, वेदना, पीड़ा और किसी की हत्या नहीं होती। प्राणी मात्र से यदि द्वेष निकल जाए तो परंपरा, प्रेम व सौहार्द का बोल-बाला रहता। विडंबना यह है कि जाति- धर्म के नाम पर, अमीर- गरीब, ऊच्च- नीच, के भेदभाव को लेकर हम आपस में लड़ते रहते हैं। अपने धर्म को बड़ा और दूसरे के धर्म को छोटा कहकर मानव के अंदर बैठे परमात्मा को कष्ट पहुंचाते हैं। आज अनेकता में एकता दर्शाने की जरूरत है। 

श्री विद्यार्थी ने कहा कि- सांप्रदायिकता की भावना से मानव समाज में फूट पड़ती है। आज प्रत्येक व्यक्ति अपने अंदर समाहित अभिमान एवं द्वेष का परित्याग कर वसुधैव कुटुंबकम की राह पर अग्रसर हो। तभी सच्चे अर्थों में विश्व में शांति स्थापित हो सकेगी।

रिपोर्ट:- नितेश पाठक

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