जानें अपना राशिफल
*🌞~ वैदिक हिन्दू पंचांग ~🌞*
*⛅दिनांक - 01 अक्टूबर 2026*
*⛅दिन - गुरुवार*
*⛅विक्रम संवत् - 2083*
*⛅अयन - दक्षिणायण*
*⛅ऋतु - शरद*
*⛅मास - आश्विन*
*⛅पक्ष - कृष्ण*
*⛅तिथि - पञ्चमी दोपहर 12:35 तक तत्पश्चात् षष्ठी*
*⛅नक्षत्र - रोहिणी प्रातः 04:27 अक्टूबर 02 तक, तत्पश्चात् मृगशिरा*
*⛅योग - सिद्धि रात्रि 09:18 तक तत्पश्चात् व्यतीपात*
*⛅राहुकाल - दोपहर 01:46 से दोपहर 03:15 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*
*⛅सूर्योदय - 06:18*
*⛅सूर्यास्त - 06:14 (सूर्योदय एवं सूर्यास्त उज्जैन मानक समयानुसार)*
*⛅दिशा शूल - दक्षिण दिशा में*
*⛅ब्रह्ममुहूर्त - प्रातः 04:42 से प्रातः 05:30 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*
*⛅अभिजीत मुहूर्त - दोपहर 11:53 से दोपहर 12:40 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*
*⛅निशिता मुहूर्त - रात्रि 11:52 से मध्यरात्रि 12:41 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*
*🌥️व्रत पर्व विवरण - पञ्चमी, षष्ठी का श्राद्ध, रोहिणी व्रत, व्यतीपात योग bu (रात्रि 09:18 से शाम 06:18 अक्टूबर 02 तक)*
*🌥️विशेष - पंचमी को बेल खाने से कलंक लगता है एवं षष्ठी को नीम की पत्ती फल या दातून मुँह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)*
*स्वास्थ्यकारक नुस्खे*
रोज़ हरी अथवा सूखी मेथी का सेवन करने से शरीर के 80 प्रकार के वायु-रोगों में लाभ होता है ।
नूतन ज्वर में तेज वायु का सेवन, दिन में अधिक समय तक शयन, स्नान, मालिश, मैथुन, क्रोध और परिश्रम करना हानिकारक है
पुराने ज्वर में रोगी को घी और दूध अवश्य देना चाहिए। सर्वज्वाराणां जीर्णानां क्षीरं भैषज्यमुत्तमम् । इस वचन से पुराने ज्वर में दूध को उत्तम औषध माना है। नये ज्वर में दूध को सांप के ज़हर जैसा हानिकारक कहा गया है।
ज्वर चले जाने के पश्चात् जब तक शरीर में शक्ति न आये तब तक मैथुन, व्यायाम, यात्रा करना, देर से पचने वाला भोजन, सूर्य के ताप या वायु का अति सेवन और ठंडे जल से स्नान करना हितकर नहीं
सब प्रकार के उदर रोगों में मट्ठे और गौमूत्र का सेवन अति लाभदायक है।
स्वप्नदोष में रात्रि को मधुर पदार्थ का सेवन, रात्रि को भात खाना, अजीर्ण में भोजन, वातल पदार्थों का अति सेवन, खट्टा पदार्थ खाना, तम्बाकू, चाय आदि हानिकारक हैं। प्रातः, सांय स्वच्छ वायु में घूमना, दीर्घ श्वास लेना, सात्विक भोजन, ईश्वर-स्मरण, रात्रि को भोजन के बदले केवल दूध पीना – ये सब लाभदायक हैं।
नेत्ररोग में गुड़, मिर्च, तेल, शुष्क अन्न, कब्जकारक पदार्थ और रात्रि जागरण – इन सबका त्याग करना चाहिए। त्रिफला रसायन का उपयोग करना चाहिए।
कान के रोग में रस आदि औषधि प्रातः और तेल आदि औषधि सूर्यास्त के बाद डालनी चाहिए।


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