नवजातों के इलाज के साथ दिल भी जीत रहे डॉ. सिद्धार्थ
माताओं को समझाते हैं देखभाल के गुर, मरीजों के नाम याद रखना और आत्मीय व्यवहार बनी पहचान
बलिया। किसी नवजात की तबीयत बिगड़ जाए तो माता-पिता की दुनिया चिंता में घिर जाती है। मन में तमाम सवाल होते हैं और हर पल बच्चे की सलामती की फिक्र सताती है। ऐसे में जब चिकित्सक इलाज के साथ भरोसा और अपनापन भी देता है, तो परिवार की चिंता काफी हद तक कम हो जाती है। जिला महिला अस्पताल में तैनात उपमुख्य चिकित्सा अधिकारी एवं वरिष्ठ नवजात शिशु एवं बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सिद्धार्थ इसी मानवीय व्यवहार से लोगों का दिल जीत रहे हैं।
जिला महिला अस्पताल के प्रश्नोत्तर केंद्र पर तैनात डॉ. सिद्धार्थ नवजातों के उपचार के साथ उनकी माताओं को बच्चे की देखभाल के तरीके भी समझाते हैं। साफ-सफाई से लेकर जरूरी सावधानियों तक, वह छोटी-छोटी बातों की जानकारी देकर माताओं को जागरूक करते हैं, ताकि अस्पताल से घर लौटने के बाद भी बच्चे की उचित देखभाल हो सके।
मरीजों के नाम याद रखना, व्यवहार में अपनापन
डॉ. सिद्धार्थ की खासियत सिर्फ उपचार तक सीमित नहीं है। वह अपने यहां आने वाले मरीजों और उनके परिजनों को पहचानने के साथ कई बार उनके नाम भी याद रखते हैं। उनकी बात ध्यान से सुनना, परेशानियों को समझना और सहजता से जानकारी देना मरीजों के मन में भरोसा पैदा करता है।
दवा के साथ संवेदनशीलता भी जरूरी
नवजात शिशुओं के मामले में माता-पिता की चिंता स्वाभाविक है। ऐसे समय में चिकित्सक का धैर्य और संवेदनशील व्यवहार परिवार को हिम्मत देता है। डॉ. सिद्धार्थ की कार्यशैली समाज को संदेश देती है कि एक अच्छा चिकित्सक वही है, जो बीमारी का उपचार करने के साथ मरीज और उसके परिजनों की भावनाओं को भी समझे। क्योंकि सही उपचार के साथ भरोसा, अपनापन और मानवीय संवेदना भी स्वास्थ्य सेवा की पहचान हैं।
रिपोर्ट त्र्यंबक पांडेय गांधी


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