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क्या अयोध्या मामले को हल करने के प्रयास ने चन्द्रशेखर सरकार गिरायी थी?






'जाओ और उनसे कह दो, चंद्रशेखर एक दिन में तीन बार अपने विचार नहीं बदलता....’ चन्द्रशेखर को इस्तीफ़ा वापस लेने के लिए मनाने आए शरद पवार यह बात अपनी आत्मकथा ‘ऑन माई टर्म्स’ में लिखते हैं। वो राजीव गांधी के कहने पर चंद्रशेखर से मिलने आए थे। दरअसल 6 मार्च 1991 को सरकार को कांग्रेस का बाहर से समर्थन वापस खींच लेने पर चन्द्रशेखर ने उसी दिन प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया था।

शरद पवार लिखते हैं: मैंने कहा, 'कुछ ग़लतफ़हमियाँ हुई हैं. कांग्रेस नहीं चाहती है कि आपकी सरकार गिरे. आप अपना इस्तीफ़ा वापस ले लीजिए. हम चाहते हैं कि आप अपने पद पर बने रहें.' प्रत्युत्तर में चंद्रशेखर ग़ुस्से से कांपते हुए बोले, 'आप प्रधानमंत्री के पद का कैसे इस तरह उपहास कर सकते हैं? 

फिर आख़िर किन परिस्थितियों में चार महीने पहले चंद्रशेखर जैसे युवा तुर्क और फ़ायरब्राण्ड शख़्स ने सरकार बनाने के लिए राजीव गांधी पर विश्वास कैसे कर लिया होगा?

बीबीसी के लिए रेहान फ़ज़ल को राम बहादुर राय बताते हैं, "मैंने यही सवाल चंद्रशेखर से पूछा था उनका जवाब था कि मैं सरकार बनाने के लिए देश हित में तैयार हुआ, क्योंकि उस समय देश में ख़ूनख़राबे का माहौल था. जिन दिन मैंने शपथ ली, उस दिन 70-75 जगहों पर कर्फ़्यू लगा हुआ था. युवक आत्मदाह कर रहे थे. दूसरी तरफ़ सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे. मुझे सरकार बनाने और चलाने का कोई अनुभव नहीं था. 

लेकिन मेरा विश्वास था कि अगर देश के लोगों से सही बात कही जाए तो देश की जनता सब कुछ करने के लिए तैयार रहेगी...."

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उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित इब्राहिमपट्टी गांव के एक साधारण किसान परिवार में पैदा हुए चन्द्रशेखर 1977 से 1988 तक जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे थे।छात्र जीवन से ही राजनीति में रुचि रखने वाले चन्द्रशेखर क्रांतिकारी जोश एवं गर्म स्वभाव वाले वाले आदर्शवादी के रूप में जाने गए। 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय (1950-51) से राजनीति विज्ञान में अपनी मास्टर डिग्री करने के बाद वे समाजवादी आंदोलन में शामिल हो गए। आचार्य नरेंद्र देव के करीबी का सौभाग्य प्राप्त था। बलिया में जिला प्रजा समाजवादी पार्टी के सचिव से होते हुए वे उत्तर प्रदेश में राज्य प्रजा समाजवादी पार्टी के संयुक्त सचिव बने। 1955-56 में वे उत्तर प्रदेश में राज्य प्रजा समाजवादी पार्टी के महासचिव बने।
1962 में वे उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गए। जनवरी 1965 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होने के बाद 1967 में उन्हें कांग्रेस संसदीय दल का महासचिव चुना गया। 

संसद के सदस्य के रूप में दलितों के लिए आवाज़ उठाते हुए प्रयास किया कि समाज में तेजी से बदलाव लाने के लिए प्रभावशाली नीतियाँ बनें। इसके लिए उन्होंने समाज में उच्च वर्गों के गलत तरीके से बढ़ रहे एकाधिकार के खिलाफ अपनी आवाज उठाई। वे एक ऐसे ‘युवा तुर्क’ नेता के रूप में सामने आए जिसने दृढ़ता, साहस एवं ईमानदारी के साथ निहित स्वार्थ के खिलाफ लड़ाई लड़ी।सर्वथा व्यक्तिगत राजनीति के खिलाफ रहने वाले चन्द्रशेखर ने वैचारिक तथा सामाजिक परिवर्तन की राजनीति का समर्थन किया। 

इसी सोच ने उनको 1973-75 के अशांत एवं अव्यवस्थित दिनों के दौरान जयप्रकाश नारायण एवं उनके आदर्शवादी जीवन के और अधिक करीब ले गई। सम्भवतः इसी कारण वे कांग्रेस पार्टी के भीतर असंतोष का सबब बन गए। जब 25 जून 1975 को आपातकाल घोषित हुआ तो उन्हें आंतरिक सुरक्षा अधिनियम के तहत उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया बावजूद इसके कि वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शीर्ष निकायों, केंद्रीय चुनाव समिति तथा कार्य समिति के सदस्य थे।

6 जनवरी 1983 से 25 जून 1983 तक दक्षिण के कन्याकुमारी से नई दिल्ली में राजघाट (महात्मा गांधी की समाधि) तक की गयी उनकी महापदयात्रा का एकमात्र लक्ष्य था – लोगों से मिलना, उन्हें जानना एवं उनकी महत्वपूर्ण समस्याओं को समझना।

इंदिरा लहर में 1984 का लोकसभा चुनाव छोड़ दें तो 1962 से वे लगातार संसद सदस्य रहे चन्द्रशेखर ने सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा सहित देश के विभिन्न भागों में लगभग पंद्रह भारत यात्रा केंद्रों की स्थापना की थी ताकि वे देश के पिछड़े इलाकों में लोगों को शिक्षित करने एवं जमीनी स्तर पर कार्य कर सकें। 

चन्द्रशेखर के सूचना सलाहकार रहे और अभी जेडीयू के सांसद हरिवंश बताते हैं, ‘समय मिला होता तो वो देश के सबसे प्रभावशाली प्रधानमंत्री होते।चार महीने के कार्यकाल में अयोध्या विवाद, असम चुनाव, पंजाब समस्या, कश्मीर समस्या सबके समाधान की तरफ़ उन्होंने कदम बढ़ाए और बहुत हद तक उन चीज़ों को आगे ले गए।... वो फ़ैसला लेना जानते थे।’

चन्द्रशेखर ने अपने छोटे से कार्यकाल में अयोध्या विवाद को भी सुलझाने की पूरी कोशिश की। बाद में उन्होंने इस बात का ख़ुलासा भी किया कि अगर उन्हें दो महीने का वक़्त और मिल जाता तो बाबरी मस्जिद विवाद सुलझ गया होता।

बीबीसी के लिए रेहान फ़ज़ल से बात करते हुए चन्द्रशेखर के नज़दीकी और उस समय प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री रहे कमल मोरारका बताते हैं, ‘मुझे लगता है कि ये जो बाबरी मस्जिद का फ़ैसला कराने को जो उन्होंने प्रयास किया, उसकी वजह से उनकी सरकार गई. उन्होंने शरद पवार को ये बात बताई. उन्होंने उसे राजीव गाँधी तक पहुंचा दिया।’

तो क्या अयोध्या मामले को हल करने के प्रयास ने चन्द्रशेखर सरकार गिरायी?
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हमेशा सत्ता की राजनीति का विरोध करते थे एवं लोकतांत्रिक मूल्यों तथा सामाजिक परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्धता की राजनीति को महत्व देने वाले चन्द्रशेखर ‘रहबरी के सवाल’ में स्वयं के शब्दों में अपने जीवन के कुछ प्रमुख पड़ावों और विचार-बिदुओं को नए संदर्भों में नए सिरे से प्रस्तुत किया। इससे पहले आपातकाल के दौरान जेल में बिताये समय में उन्होंने हिंदी में एक डायरी लिखी थी जो बाद में ‘मेरी जेल डायरी’ के नाम से प्रकाशित हुई। ‘सामाजिक परिवर्तन की गतिशीलता’ उनके लेखन का एक प्रसिद्ध संकलन है। 

पिछले साल ही राज्यसभा उपसभापति हरिवंश और रविदत्त बाजपेई द्वारा द ‘चन्द्रशेखर: लास्ट आइकॉन ऑफ़ आयडीअलॉजिकल पॉलिटिक्स’ का लोकार्पण करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम उस समय उन्हें वह सम्मान नहीं दे पाए, जिसके वे हकदार थे। साथ ही इस बात पर दुःख प्रकट किया कि कुछ लोगों की चौकड़ी है, जिसने डॉ. अंबेडकर और सरदार पटेल सहित कुछ महान भारतीय नेताओं की प्रतिकूल छवि बनाने की कोशिश की है। जननायक चन्द्रशेखर भी ऐसे ही ‘चांडाल’ चौकड़ी के निशाने पर रहने वाले नेताओं में से एक थे।
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लोकतांत्रिक मूल्यों तथा सामाजिक परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्ध जननायक चन्द्रशेखर की आज जयंती है। सादर नमन, विनम्र श्रद्धांजलि 🙏🏻


                         निर्मल पाण्डेय

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