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भगवान की शरणागति प्राप्त करने का सुगम साधन है उनकी भक्ति:-जीयर स्वामी





दुबहर । क्षेत्र के जनेश्वर मिश्रा सेतु के एप्रोच मार्ग के निकट हो रहे चातुर्मास यज्ञ के दौरान श्रीमद् भागवत महापुराण की कथा सुनाते हुए संत लक्ष्मी प्रपन्न जियर स्वामी ने कहा कि नैमिषारण्य की धरती पर ऋषियों को कथा सुनाते हुए सूत जी से शौनक ऋषि ने पूछा कि भगवान के सहज प्राप्ति का क्या उपाय है ? इस पर सूत जी ने बताया कि भगवान को सहज प्राप्त करने का श्रेष्ठ साधन  उनकी शरणागत हो जाना है । उनकी शरण में चले जाएं तो भगवान की सहज प्राप्ति हो जाती है । इसका उदाहरण कबीर, मीरा, तुलसी, रविदास और हनुमान जी आदि लोग हैं ।  जिन्होंने भगवान की शरणागति पाकर धन्य हो गए । कहा कि भगवान का सबसे प्रिय भोजन अहंकारियों का अहंकार है ।  भगवान अहंकार का भोजन करते हैं उन्होंने किसी का अहंकार उनके पास रहने नहीं दिया । भगवान ने एक से एक प्रतापी, बड़े से बड़े लोगों का अहंकार खा गए । जीवन में अहंकार न आए इसके लिए मानव को अपने समस्त दैनिक कार्यों एवं दिनचर्या के समस्त विषयों को प्रभु को समर्पित करके करना चाहिए । अपने मन में यह नहीं पालना चाहिए यह मैंने किया है बल्कि मन में यह भावना आनी चाहिए जो भी हो रहा है प्रभु कर रहे हैं । यही शास्त्रों का सार भी है क्योंकि भटके हुई लोगों को सही मार्ग पर लाने का कार्य हमारे शास्त्र करते हैं । कहा कि भगवान के प्रत्येक अवतारों में  एक से बढ़कर एक अद्भुत चरित्र देखने को मिला है । सनातन धर्म के प्रत्येक गृहस्थी को अपने-अपने घर में श्रीमद् भागवत की पुस्तक अवश्य रखनी चाहिए । क्योंकि भागवत में भगवान अक्षर के रूप में श्लोक के रूप में विराजमान रहते हैं । समय मिले तो महिला हो या पुरुष 24 घंटे में कम से कम आधा घंटा भागवत का अध्ययन जरूर  करना चाहिए ।  भागवत महापुराण उस दर्पण की तरह है जो मनुष्य को उसकी आंतरिक सुंदरता का बोध करवाता है।

कहा कि भागवत कथा ज्ञान और वैराग्य रूपी वृक्ष के एक पका हुए सु स्वादिष्ट फल के समान है। इससे सेवन से मोक्ष का मार्ग आसानी से प्रशस्त हो जाता है। उन्होंने बतलाया कि श्रीमद्भागवत महापुराण चारो वेदों के सम्पूर्ण ज्ञान का सागर व भक्त और भगवान के बीच एक कड़ी श्रीमद्भागवत है। 

उन्होंने कथा के दौरान माता गंगा और राजा शांतनु के विवाह की कथा को विस्तार से सुनाया ।

रिपोर्ट:-नितेश पाठक

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